बुरांश का फूल .
चुरा कर लाया हूँ इसे परियों के शहर से,पहाड़ों की डगर से, ख्वाबों की महक से।यह वो नगीना है, जो नसीबों में भी नहीं,दिखाई देता है, पर किसी की नजर में नहीं।यह अनमोल है, पर हाथों की लकीरों से परे है,कोई चाहता है इसे, तो कोई देखे चुप...
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