चुरा कर लाया हूँ इसे परियों के शहर से,
पहाड़ों की डगर से, ख्वाबों की महक से।
यह वो नगीना है, जो नसीबों में भी नहीं,
दिखाई देता है, पर किसी की नजर में नहीं।
यह अनमोल है, पर हाथों की लकीरों से परे है,
कोई चाहता है इसे, तो कोई देखे चुप खड़े है।
यह मेरा अक्स है, और मेरे अपने में है कही,
किसी की किस्मत में नहीं, किसी की नियत में नहीं!