हवा के संग वो गा रहा,
पहाड़ों की गोद में मुस्कुरा रहा,
मिट्टी की खुशबू में समा रहा।
हरी शाखों पर झूलता,
सपनों की चादर बुनता,
लाल रंग में लिपटा कोई संदेश,
दिल की गहराइयों में उतरता।
नर्म हथेलियों पर सजे,
वो काफल मुझे बुला रहा,,,
वो काफल मुझे बुला रहा,
हिमालय की गोद में,
पहाड़ों की ठंडी हवा,
मेरे दिल को छू रहा।
लाल-लाल फल हंसते हैं,
डालियों पे झूमते हैं,
जंगल की वो सैर पुरानी,
यादों में फिर लौट आए।
पगडंडी, पत्थर, धूप-छाँव,
यादों का वो मीठा गाँव,
काफल की टोकरी सजाए,
दोस्तों संग मुस्काए।
वो काफल मुझे बुला रहा,
वक्त को पीछे ले जा रहा,
हर फल में छुपा है बचपन,
हर स्वाद में गूँजता गान।
आज फिर मन डोल उठा,
पहाड़ों का मोल उठा,
वो काफल, वो जंगल, वो राह,
मुझे फिर बुला रहा।