जो गूंगे थे सदियों से, तूने उन्हें बोलना सिखाया।
मंदिरों से जो निकाले गए, तूने उन्हें संसद में बैठाया,
हर आँख में सपना और हर दिल में तूने अधिकार लेखा था।
शोषण की उस भीड़ में, तूने इंसान देखा था,
…
न जात-पात की रेखाएँ, न ऊँच-नीच का द्वार,
तेरे विचारों से मिला, सबको बराबरी का अधिकार।
कभी जो झुकाए खड़े थे, आज वो सीना तानते हैं,
तेरे संविधान की छाया में, हक़ से अब वो जीते हैं।
……
तेरी लिखी विधान को हर एक इंसान पढ़ता है,
हर पीढ़ी तेरी सोच से, नई रोशनी में ढलता है।
पग-पग पर रोकी गई राहें, मगर तू रुका नहीं,
तेरे इरादों को झुका सके, ऐसा कोई झोंका नहीं।
तेरे हर अनुच्छेद में, एक क्रांति की बात है,
तेरे हर नियम में, मानवता की सौगात है।
कलम तेरी न तलवार थी, न कोई ढाल बनी,
पर उस स्याही की ताक़त से, बदल गई ये ज़मीं।
तूने वो देखा जो कोई न देख पाया था,
शोषितों की आवाज़ बना, तू सबका मसीहा था,
बिना थके, बिना रुके, तू न्याय का सवेरा था।
काबिलियत को भी जब समाज ने झुठलाया था।
खुद को जलाकर तूने औरों को उजाला दिया,
अपना हक़ पाने का सबको हौसला दिया।
तू सिर्फ संविधान निर्माता नहीं, तू भविष्य का दृष्टा था,
जिसने हमें बताया कि आज़ादी के बाद क्या रास्ता था।
नफ़रत की आँधियों में भी, तूने प्रेम बोया था,
अन्याय के जंगल में तूने न्याय का बीज बोया था।
कभी लाठी नहीं उठाई, न हिंसा का नाम लिया,
तर्क और विचारों से तूने हर तख़्त हिला दिया।
संविधान के पन्नों में तू आज भी ज़िंदा है,
तेरे संघर्ष की गूँज, हर दिल में अभी भी जिन्दा है।…
हर अनुच्छेद में बसी तेरी सोच, तेरे विचार हैं।
शब्द तेरे सिर्फ़ कानून नहीं, इंसानियत की पुकार हैं,